Posted by
Pankaj Trivedi
In:
अतिथि-कविता
हर हार मुझे और हराती है... जेन्नी शबनम
आज मैं खाली खाली सी हूँ
अपने अतीत को टटोल रही,
तमाम चेष्टा के बाद भी
सब बिखरने से रोक न पायी !
नहीं मालूम जीने का हुनर
क्यों न आया ?
अपने सपनों को पालना
क्यों न आया ?
जानती हूँ मेरी विफलता का आरोप
मुझपर हीं है,
मेरी हार का
दंश मुझे हीं झेलना है !
पर मेरे सपनों की परिणति
पीड़ा तो देती है न,
हर हार मुझे
और हराती है !
Posted on
-
13 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
अतिथि-कविता
सरोज सिंह की कविता
"तेज़ बारिशों में....
सब परिंदे,ढूंढ़ते हैं
पनाह! छिपने की
इक परिंदा 'चील' है
जो नहीं करता परवाह
भीगने की..और उड़ता है
बेफिक्री से 'बादलों के पार'
..
"उसी तरह मुश्किलें,
सभी की एक जैसी
कुछ उससे 'हार' जाते हैं
कुछ उसके 'पार' जाते हैं
जो उसके 'पार' जाते हैं
Posted on
-
4 Comments
Subscribe to:
Posts (Atom)

