Posted by
pankaj trivedi
In:
अतिथि-कविता
गझल : दुष्यंत कुमार
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोइ ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं |
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं |
तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह,
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं |
तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जायें,
अदीब वों तो सियासी हैं पर कमीं नहीं |
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है, तू मशीन नहीं |
बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है, हसीन नहीं |
ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो,
तुम्हारी हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं |
(साये में धूप - से साभार )
Posted on
undefined
undefined -
3 Comments
This entry was posted on 7:31 PM and is filed under अतिथि-कविता . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
3 comments:
आद दुष्यंत कुमार त्यागी जी को पढ़ना हमेशा अद्भुत अनुभव है... उन्हें सादर नमन...
विश्व्गाथा का आभार
gajal of dushyantkumr are very interesting. this is syllaby for students
12 ka 4
Post a Comment