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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
"एक और क्रांति का सूत्रपात..." मनोज जोशी
सदियाँ बीत गयी क्रान्ति होते हुए...
हर जमीं पर क्रांति का आगाज होता है..
नयी राजसत्ता आती है !
बदलाव आता है चेहरों में !
मगर बदलता कुछ नहीं !
आम आदमी कल भी सड़क पर था !
आज भी और कल भी रहेगा...!
सूत्रपात होगा फिर एक क्रान्ति का... !
एक नए चेहरे के लिए !
नयी व्यवस्था के लिए !
मगर बदलेगा कुछ नहीं !
आदमी वहीँ खड़ा देखता रहेगा -
बदलते चेहरे ! बदलती व्यवस्था !
खुनी राजप्रासादों में नए षड्यंत्र !
कुछ और ऊँची दीवारें...
कुछ और बौने आदमी और उनकी तुच्छ लिप्साएं...!
देखते सहते फिर होगा एक और क्रांति का सूत्रपात...
एक और क्रांति का सूत्रपात...
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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
"इन्द्रधनुष"... जूली मुलानी
वेलेन्टाईन की मेघधनुषी शुभ कामनाएँ 
धुंधला रहे मंज़र में कुछ ना था स्पष्ट...
ना भूत, ना भविष्य और ना मैं...
कुछ था... तो वर्तमान...
जिसमें देख सकती थी...
धुंधली-सी यादें... ... ...
उन यादों से जुड़े मंज़र...
जो चमकते थे अब भी...
सतरंगी इन्द्रधनुष से...
जिनके चमकते रहने की उम्मीद थी पूरी.....
मेरे सपनों के आसमान में...
पर आसमानी चीजें...
कब छूती है ज़मीन को...
वो तो होती हैं क्षणिक...
खो जाती हैं... ... ...
जाने कहाँ...
जैसे ना था कोई अस्तित्व उनका...
ढूंढते रह जाते हैं 'हम' वो रंग...
और खो देते हैं...
'खुद' का रंग...
इन्द्रधनुष के रंगों में...
मगर छंटते बादलों के पीछे से...
चमकती किरणें...
करा जाती हैं एहसास...
कि कुछ रंग खोने के बाद ही...
हम देख पाते हैं... असली रंग...
जिसमें कोई बनावट नहीं...
कोई सजावट नहीं...!!
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