संतोष श्रीवास्तव की कवितायें

१. पतझड़
ये सूखे, शाख़ों से रूठे से पत्ते
हवा में खड़कते, लरजते ये पत्ते
बहारों में नाज़ुक सी कोपल में उभरे
शाख़ों की उँगली में मरकत से पनपे
इवा गुदगुदाती तो शरमा के पत्ते
लुके जाते अपनी ही डालों में पत्ते
लरजते सरसते से रूमानी पत्ते
बहकते, सम्हलते, मचलते ये पत्ते
मगर आज पीले, रूठे से पत्ते
झरे जा रहे हैं
खि़ज़ाँ से सहमते झरे जा रहे है।
हवा एक बौरायी महबूबा जैसी
बिफ़रती, खड़कती
बियाबाँ में अपनी चीखें पिरोती
अपने महबूब पत्तों की मैयत उठाए
चली जा रही है
झरे पत्र पर सर धुने जा रही है
चली जा रही है, चली जा रही है।
2. नदी तुम रूको
नदी तुम रूको
तो मैं पल्लू पकड़ लूँ
तो मैं लहरों पे लिख दूँ
कई चिट्ठियाँ
नदी तुम रूको
वक्ष पर मैं तुम्हारे हथेली धरूँ
और हथेली में लाखों लकीरें भरूँ
अपने शब्दों के रूमाल
शँखों में बाँधू
भावुक सी कुछ सीपियाँ
तुमसे माँगू
नदी तुम रूको
चाँद का अक्स मुझको उठाने तो दो
मेरे हाथों को कुछ मुस्कुराने तो दो
नदी तुम रूको
मेरी जानिब झुको
204, केदारनाथ को.हा.सो.,सेक्टर 7, निकट चारकोप बस डिपो,
कांदिवली (प)मुम्बई - 67
फोन - ९८६९०४१७०७ / 9769023188
अनसुलझ पहली ..... गायत्री रॉय
बिखरी वो ज़िन्दगी अंधरे के साये में.....
बिखर गए हर मोती,टूटे हुए उस हार से,
पलक फलक निहारती, थकी हुई उस हार से....
ऐ खुदा तू बख्स दे ,ज़िन्दगी के रंगीन पल,
अंधरे मे डूब चुका,खता हुई ये दल बदल...
ना मौत आये हमे ना लौट कर ये ज़िन्दगी ही मिली,
जिए जाते है हम उस उम्मीद पर वो कभी लौट कर नहीं मिला....
छुपा कर दिल मे रखते है, सभी इलज़ाम ले ले कर
दिलों के खेल रहे इस कदर जी रहे हैं जख्म सह सह कर....
हर घाव की सिसक पर रोता है ये मन,
अब भूले से ही रह गयी तड़पता है ये मन.....
ज़िन्दगी के इस खेल मे वो भी एक मोहरा बन बैठा,
किसी ने चल दी हम पर कि मात वो भी खा बैठा....
धीमे से उठी हर आहट का, सितमगार ना बनाओ,
मुरझाये फूल को खिलने की, कोशिश का मददगार ना बनाओ...
कलियों को जब पलट कर देखा, तो उसने भी आंसू झरक दीये,
जीवन के हर मर्यादित रूपों को, दिल से ही लिपट लिया...
