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संक्रांति एक-रुप अनेक - जया केतकी




भारत में पर्वो की लंबी श्रंृखला है एक ही पर्व सारे देश में अलग-अलग नाम तथा तरीके से मनाया जाता है। इसी प्रकार मकर संक्रांति एक बड़ा त्यौहार है, जिसे सारे भारत मंे धूमधाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में संक्रांतिः-तिल-गुड़ घ्या, ग¨ड़-ग¨ड़ ब¨ला, कहते हुए, तिल के साथ गुड़ मिलाकर देना शुभ माना जाता है। संक्रांति के दिन हल्दी-कुम-कुम लगाकर महिलाएं एक दूसरे क¨ क¨ तिल-गुड़ देती हैं। इसका अर्थ है कि सभी पिछले बुरे अनुभव भूलकर प्रेम और सौहार्द से रहें। भोजन में तिल-गुड़ से बनी पूरणप¨ई विशेष पकवान के रुप में जरुर बनाई जाती है। तमिलनाडुः-तमिलनाडु में संक्रांति पोंगल नाम से प्रसिद्ध है। यह किसान का सबसे बड़ा पर्व है। इस दिन मीठे-चावल तथा दाल-चावल मिलाकर पुलाव बनाया जाता है।इस दिन सूर्य की पूजा की जाती है। सुबह से ब्रह्म मुहूर्त स्नान कर स्त्रियाँ दरवाजें के सामने बड़ी सी रंग¨ली बनाती हैं और उंगते सूर्य की पूजा करती हैं। इसे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। गाय और बैल को नहलाकर रंगा और पूजा जाता है। पंजाबः- यहां मकर संक्रांति उत्सव ल¨हरी के नाम से जाना जाता है। संक्रांति से एक दिन पूर्व शाम को लकड़ी का बड़ा सा अलाव जलाया जाता है। उसके चारों ओर घूमकर परिवार के सदस्य ओर मित्रों नृत्य करते हैं। गन्ना और रेवड़ी प्रसाद स्वरुप बांटा जाता है। फिर सभी आग के इर्द-गिर्द बैठकर भोजन हैं। उत्तरप्रदेशः- यहां मकर संक्रांति का त्यौहार खिचड़ी के नाम से मनाया जाता है। इस दिन चावल के साथ हरी मूंगदाल मिलाकर खिचड़ी के रुप में बांटते हैं। तिल के लड्ड प्रमुख व्यंजन के रुप में बनाये जाते हैं। एक माह का विशाल मेला आय¨जित किया जाता है। इस दौरान पवित्र गंगा-यमुना-सरयू के संगम में स्नान करना बड़ा शुभ माना जाता है। बंगालः-गंगा सागर मेले के आयोजन के साथ बंगाल मंे संक्रांति पर्व मनाया जाता है। हजारों -लाख¨ं शृद्धालु इस पवित्र पर्व पर गंगा सागर में स्नान कर अपने पाप धोते हैं तथा अपने पितरों के मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। आंध्रप्रदेशः-आंध्रप्रेदश में संक्राति का पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन- भोगी-पोंगल, दूसरे दिन संक्रांति तथा तीसरे दिन कनुमा पोंगल कहलाता है। चतुर्थे दिन पर्व का समापन मुक्कानुमा के रुप में किया जाता है। सुबह स्नान कर घर के प्रमुख द्वार पर रंगोली डालना, भजन गाना और माना जाता है। तेलगू में इसे पेडा-पेन्डुगा कहते हैं। गुजरातः-संक्रांति पर्व क¨ गुजरात में सामाजिक त्यौहार के रुप में मनाया जाता है। यहां पर इस पर्व पर किया जाने वाले पतंग¨त्सव विश्व विख्यात है। इस दिन उपहार देने का विशेष महत्व है। घर के बड़े-बूढ़े छोटों को उपहार देते हैं। पडौसी एवं मित्रों एक दूसरे को देकर सद्भावना बढ़ाते हैं। गुजरात में छात्र वृत्ति देकर विद्यार्थीओं को उच्च शिक्षा के लिए भेजना इस पर्व की विशेषता है। कर्नाटकः-कर्नाटक में नामक तिल-नारियल-शक्कर के मिश्रण को पर्व का स्वागत किया जाता है। गन्ने का आदान-प्रदान भी शुभ माना जाता है। गाय-बैल क¨ नहलाकर सजाते हैं और ढोल बजाकर गलियों , घूमायें जाते हैं। रात में जलाकर जानवरों को उसके ऊपर से कुदाया जाता है। इलू बेला थिंडू-अ¨ले माथूआडू ब¨लकर इलू बांटा जाता है। केरलः-केरल में अयप्पा के पूजकों चालीन दिवसीय पर्व मनाया जाता है। यह विशाल पर्व सबरीमाला में समाप्त ह¨ता है। उड़ीसाः-उड़ीसा के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में संक्रांति का त्यौहार नववर्ष के रुप में मनाया जाता है। अलाव जलाकर नाच, गाकर पर्व का स्वागत किया जाता है। सब एक जगह एकत्रित होकर भोजन करते हैं तथा हस्तकला की वस्तुओं का बाजार लगाया जाता है। आसामः-आसाम में संक्रांति पर्व भ¨ग¨ली बिहू के नाम से जाना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में स्नानकर दान किया जाता है। सूर्य की पूजा कर पूर्वज¨ं के लिए तर्पण किया जाता है। शाम को-पुरुष एक साथ एकत्रित होकर आग जलाकर नृत्य करते हैं। हिन्दू धर्म में व्रत कथा दान की परंपरा विशिष्ट महत्व रखती है। ग्रीष्म ऋतु में जल दान, शीत ऋतु में घी दान और बरसात में दान का विशेष महत्व पुरानों में बताया गया है। सूर्य की दशा के आधार पर देवों निशाकाल तथा प्रभातकाल परिभाषित किया गया है। पुरानों के अनुसार सूर्य दक्षिणायन होते हैं तब देवों का निशाकाल माना जाता है तथा जब सूर्य उत्तरायन होते हैं, तब देवों का प्रभातकाल होता। सूर्य के उत्तरायन ह¨ने का पर्व मंकर संक्रांति के रुप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान की महिमा को महान बताया गया है। इस दिन गंगा स्नान करके, गंगा के तट पर ऊनी तथा घी का दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन जप, तप, अनुष्ठान किये जाते हैं। मकर संक्रांति के दिन किया गया दान दानों के बराबर होता इस पर्व के दिन तिल के लड्डू बनाकर दान किये जाते हैं, हरी मूंग की दाल तथा चावल मिलाकर दान करना और बनाकर खाना भी शुभ माना जाता है। भारत के अलग-अलग प्रान्तों में मकर संक्रांति का त्यौहार ढंग से मनाया जाता है। भारत के पर्व सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन सभी देव तथा देवियां मानव का रुप धरकर संगम में स्नान करने आते हैं। गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर स्नान कर वे नवीन प्रभात का स्वागत करते हैं। इसीलिए संगम पर स्नान करना इस दिन अति शुभ माना जाता है। गंगा के तट पर मेले का आय¨जन किया जाता है। जिससे उत्सव का मजा द¨ गुना ह¨ जाता है। दक्षिण भारत का पर्व पोंगल संक्राति पर्व दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। पोंगल में वर्षा के देव इंद्र की पूजा की जाती है। जिससे भरपूर वर्षा हो और फसल। यह पर्व ’इंद्रान’ भी कहलाता है। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है, चतुर्थ दिन इसका समापन होता यह दक्षिण भारत का सबसे बड़ा त्यौहार। इसका पहला दिन पोंगल कहलाता है। इसमें घर को तरह साप किया जाता हैं। आंगन में पानी सींचकर चावल के आटे से सुंदर रंग¨ली बनाई जाती है। कहीं-कहीं गाय के से बने कंडे में कद्दू का पू ल सजाया जाता है। चावल, गन्ना और हल्दी के पौधे लाकर पूजा के लिए रखे जाते हैं। रात्री के समय आग जलाई जाती है। जिसमें घर का बेकार, अनुपय¨गी लकड़ी आदि का सामान जला दिया जाता है। लड़कियां उस आग के इर्द-गिर्द नृत्य करती है। दूसरा दिन सूर्या पोंगल कहलाता है। जिसमें सूर्य की पूजा की जाती है। दरवाजे के सामने सुबह ही रंगोली बनाई जाती है। इसे कोलम हैं। महिलाएं बड़ी दिलचस्पी से घंटों इसे पूरा करती है। इस दिन दाल चावल को मिलाकर शक्कर डालकर, उपादान आने तक उबाला जाता है। सी उपादान को देखकर बच्चे पोंगल पोंगल पुकारते हैं। सूर्य की पूजा करके यही पोंगल भोग लगाया जाता है। इसी प्रकार के अन्य पकवान चावल से ही बनाएं जाते हैं। सामूहिक भोजन आयोजित किये जाते हैं। तीसरा दिन मत्तू पोंगल है। इस दिन गाय- बैलों को नहलाकर रंग लगया जाता हैं। उनके सीग को सजाया जाता है। गणेश और पार्वती की पूजा की जाती है। बैलो के सींगों में रूपये बांधकर छोड़ हैं और बड़े-बड़े पहलवान उनसे लड़कर रूपये ख¨लने का प्रयास करते हैं। सब ल¨ग रात में एक साथ मिलकर भ¨जन करते हैं। पोंगल का पर्व का चतुर्थ समापन का ह¨ता है, इसे कनुम पोंगल कहते हैं। धरती पर जीवन के प्रतीक सूर्य की पूजा के बाद, सूर्य की प्रतिमा पर गन्ने के रस की बूंदे गिराई जाती है। रक्षा-बंधन और भाई-दूज की तरह बहने अपने भाइयोंको सुख और की प्रार्थना करती हैं। इस दिन लोग एक दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं। तटस्थता बढ़ाएं मानव में वासना की परिभाषा न गुणों में आती है और दुर्गुणों में। परंतु वासना ही वह आधार है जो उसकी अंतःकरण की प्रवृत्ति क¨ बताता है। प्रवृत्ति से उसकी ल¨लुपता भी उजागर ह¨ती है और निर्लिप्तता भी। मनुष्य की आकांक्षाएं असंख्य हैं। उन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना असंभव है, किंतु आंशिक रुप से नियंत्रित किया जा सकता है। वासना से ग्रस्त मस्तिष्क अंतिम समय में भी अपनी इच्छाओं वशीभूत देह त्याग करता है। यही उसके अगले जन्म का कारण बनता है। ईश्वर ने इस नश्वर संसार में प्राणियों के असंख्य रुप बनाये हैं, जो उनके पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर उन्हें मिले। मनुष्य का जन्म मिलना सबसे कठिन है। यदि मनुष्य अपनी वासना को कर लेता है और अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश जग जाता है तो वह इस संसार के आवागमन से मुक्त होकरमोक्ष प्राप्त होता है। सांसारिक आवागमन से मुक्ति का उपाय करने की क्षमता केवल मानव मस्तिष्क को दी गई है। यदि वह अपने कर्मो से इच्छ शक्ति पर विजय प्राप्त कर लेता है तो विजय का मार्ग प्रशस्त हो है। मोह के पाश से मुक्त होना आसान नहीं। मोह का जाल इतना शक्तिशाली है कि वह देह के भोग और के रोग से मानव को बांधता चला जाता है। मोह के बंधन में जकड़ा हुआ मनुष्य, मोक्ष की गति को समझ ही नहीं पाता। मोक्ष की गति को वाले विरले ही होते हैं। जो मोह के पास से मुक्त हो जाता है, जो अपनों दूरी स्वीकार कर लेता है और जो आकर्षण से खुद को बचा लेता है, वहीं शरणागति की सीढ़ी तक पहुंचने में सफल होता है।

एतिहासिक धरोहर माधावाव (बावडी)


गुजरात का सुरेंद्रनगर जिला | यहाँ से 5 किलोमीटर दूर मूल वढवाण शहर में कईं एतिहासिक धरोहरे हैं |

उनमें से एक माधावाव |

लोकमान्यता के अनुसार वाव में पानी के लिएँ बलि दी गयी थी, उसके बाद से आज भी इस वाव में बारहों माह पानी भरा रहता है | लेकिन अब इसका उपयोग न होने के कारण इसके आसपास रहने वाले इसमें कूदा करकट फेंकते है | माधावाव के निर्माण पर यहाँ एक लोककथा प्रचलित है |

वढवाण में 1275-96 तक सोलंकी राजा सारंगदेव का शासन था | उनके मंत्री माधवजी थे | जो काफी दयालु जनता के प्रिय थे | वढवाण में पानी की किल्लत रहती थी | कोसों दूर पानी की तलाश में लोगों को भटकना पड़ता था | लोगों की परेशानी माधवजी से देखी नहीं गई तो उन्हों ने वढवाण में वाव बनवाने का तय किया | सन 1294 में माधवजी ने वाव का निर्माण कराया |

काफी गहराई के बाद भी वाव में पानी नहीं आया | इसके बारे में ब्राह्मणों से सलाह-मशविरा किया गया तो बात सामने आई कि नवयुगल के बलिदान के बाद ही वाव में पानी आएगा | यह बात सुनकर माधवजी चिंतित रहने लगे, लेकिन उनके पुत्र से यह देखा नहीं गया | माधवजी के पुत्र ने वाव में पानी लाने के लिएँ बलिदान देना तय कर लिया | माधवजी के पुत्र का कुछ समय पहले ही विवाह हुआ था |

पानी के लिएँ उन्हों ने बलिदान दिया और उसके बाद वाव लबालब हो गई | सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद आज भी माधावाव लबालब है | लेकिन बदकिस्मती यह है कि अब यह सिर्फ कूडादान बनाकर ही रह गई है | देश में ऐसी कईं एतिहासिक धरोहर को हम या हमारा पुरातत्त्व विभाग ठीक से संभाल नहीं पाते हैं, यही करूणा है | * (बावडी को गुजराती में वाव कहते हैं |)

नवलखा मंदिर - धुमली (गुजरात)


गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में ऐतिहासिक ईमारतों को ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है। हम जहां कहीं से भी गुंजरते हैं वहीं कोई न कोई गाथा पथ्थरो में अंकित दिखाई देती है।


ऐसा ही पौराणिक शिल्पकारी का उत्कृष्ट नमूना है ऐतिहासिक नवलखा मंदिर, धूमली! जामनगर जिले के भाणवड़ तहसील के मोडाणा के पास हराभरा बरड़ा का जंगल है, जिसे 'छोटा गिर अभयारण्य' भी कहा जाता है। नंजदीक ही जामबरड़ा से उत्तर दिशा में बसा है यह गांव 'धूमली'


सुरेन्द्रनगर जिले के पांचाल क्षेत्र के चोटिला शहर से दक्षिण दिशा में आनंदपुर नामक सुंदर नगर बसा हुआ था। कुछ पुरातत्वविद्दों
का मत है कि यह शहर मैत्रक काल के आरंभ में बसा होगा। वर्तमान में यह आनंदपुर-भाड़ला के नाम से ही प्रचलित है। भारत के स्वतंत्र होने से पहले कई शताब्दियों तक यह शहर काठी जाति के लोगों के हाथ में रहा था।

दूर से देखने पर लगता है कि यह मंदिर करीब दो सौ साल पहले बनाया गया होगा। मगर नजदीक जाते ही यह काफी पुराना लगता है। इस मंदिर को देखकर लगता है कि उसका पुनरोद्धार भी किया गया होगा। हो सकता है कि इस मंदिर को मुस्लिमों ने ध्वंस कर दिया हो और बाद में काठी जाति के क्षत्रियों ने इसका पुनरोद्धार करवाया हो।

इस मंदिर के बार में एक लोककथा है। कहा जाता है कि इस नवलखा मंदिर को बाबरा भूत ने एक ही रात में बनाया था। मंदिर की चारों ओर नग्-अर्द्धनग् नव लाख मूर्तियों के शिल्प हैं। पूरा मंदिर सोलह कोने वाली जगति (नींव) के आधार पर बनाया गया है। यह शिवमंदिर सोलंकी काल में बने प्रमुख महाकाय मंदिरों में से एक है, ऐसा हम कह सकते हैं। पुनरोद्धार हुए इस नवलखा मंदिर का पुराना-मूल भाग आज भी सीना तानकर खड़ा है, जब कि नये हिस्से में परिसर काफी छोटा है और आसपास ऊंचे मकान होने के कारण तसवीर लेना कठिन है।

धूमली में फिलहाल जो अवशेष प्राप्त हैं, वे बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी के माने जाते हैं। जेठवा राज्य की सब से पहली राजधानी धूमली पर्वतमाला के बीच में संकरी घाटी में स्थित थी। उसके कई खंडहर आज भी मौजूद हैं। जेठवा राज्य के इन मंदिरों का निर्माण कार्य दसवीं शताब्दी में हुआ था, ऐसी लोक मान्यता है।

यह मंदिर गुजरात के द्वादश ज्योतिलिंग में से एक सोमनाथ मंदिर की तरह ही काफी ऊंचा है। इस नवलखा मंदिर की छत और गुम्बज के भीतरी हिस्से में जो सुशोभन और नक्काशी दिखाई देती है वह अलग-अलग कालखंड की नंजर आती है। मंदिर के अंदर बड़ा सा सभा मंडप, गर्भगृह और प्रदक्षिणा पथ अन्य मंदिरों की भाँति ही है। इस मंदिर में प्रवेश के लिए तीन दिशाओं में प्रवेश चौकियां है। तीनों दिशा में पगथार भी हैं। तीन खिड़कियों से हवा और प्रकाश के कारण पर्यटकों के लिए इस मंदिर को देखना काफी रोचक अनुभव माना जाता है।

मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है और उसके ईर्द-गिर्द प्रदक्षिणा पथ है। इस नवलखा मंदिर की छत का गुम्बज अष्टकोण आकार का है। उनके ऊपर विविध पक्षिओं की आकृति पथ्थरों में तराशी गई हैं, जिसे पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। सभा मंडप की दोनों मंजिलों के स्तम्भों के उपरी हिस्से को वैविध्यपूर्ण आकार दिया गया है। उसमें ंखासतौर से मानव मुखाकृति, हाथी की मुखाकृति, वृषभ, मत्स्य युगल, सिंह की मुखाकृति, वानर, दो मुखाकृति वाला वानर, हंस युगल और कामातुर नारी के शिल्प कलात्मक दृष्टि से बड़े नमूनेदार हैं।

मंदिर के पीछे पीठ क्षेत्र में दो हाथियों का शिल्प है, जिसमें दोनों को अपनी सूंढ के द्वारा आपस में लड़ाई-मस्ती करते दिखाया गया है। मंदिर के बाहरी क्षेत्र में उत्तर दिशा में लक्ष्मी-नारायण, दक्षिण दिशा में ब्रह्मा-सावित्री और पश्चिम में शिव-पार्वती के शिल्प दिखाई देते हैं।

इस मंदिर के स्थापत्य में हमें भरपूर वैविध्य दिखायी देता है। धूमली में जेठवा साम्राज्य की दसवीं से बारहवीं-तेरहवीं शताब्दियों के बीच की समृद्धि को मंदिर की शिल्पकारी बंखूबी प्रदर्शित करती है, यह आज भी खंडहरों को देंखकर लगता है।
संदर्भ - पत्थर बोले छे! 1988 / चित्र : मुकेश त्रिवेदी

संस्कृति : विश्व प्रसिद्द तरणेतर का मेला और त्रिनेत्रेश्वर महादेव - पंकज त्रिवेदी

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले में थानगढ़ और चोटिला क्षेत्र में भगवान त्रिनेत्रेश्वर का एतिहासिक मंदिर है | मगर ग्रामीण भाषा में त्रिनेत्रेश्वर के बदले अपभ्रंश होकर "तरणेतर" के नाम से प्रचलित हो गया है | वैसे तो सामान्य दिनों में यहाँ सबकुछ उजड़ा हुआ लगता है मगर जब मेले का आयोजन होता है तब यहाँ का नज़ारा देखते ही बनाता है | तरणेतर का मेला जिस परिसर में प्रति वर्ष आयोजित होता है वह त्रिनेत्रेश्वर मंदिर कच्छ के लखपत के राजवी महाराजा करणसिंहजी ने उनकी उनकी पुत्री करणबा की स्मृति में 1902 में बनवाया था |
इस त्रिनेत्रेश्वर परिसर में मंदिर के बिलकुल सामने एक बड़ा सा कुंद है और इन दोनों के बीच में एक तुलसीक्यारा भी है | यह मंदिर सोमपुरा जातिओं की शैली का माना जाता है | परम्परागत लोक संस्कृति के प्रती तरणेतर मेले का प्रति वर्ष भाद्रपद चतुर्थी-पंचमी और छठ के दौरान तीन दिनों का आयोजन होता है | यहाँ पर राज्य के मुख्यमंत्री या किसी भी अन्य महामहिम के करकमलों से त्रिनेत्रेश्वर महादेव के मंदिर पर 52 गज की ध्वजा फहराकर मेले का शुभारम्भ किया जाता है | तीन दिवसीय इस मेले में लाखों की तादाद में लोग उमड़ पड़ते हैं | मेले में प्रतिवर्ष पांच लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा होती हैं | प्रशासन को हमेशा सतर्क रहना पड़ता है | मेले के साथ भगवान त्रिनेत्रेश्वर का नाम जुड़ा है | इनके साथ दो प्राचीन कथाएँ भी है | मंदिर के पास परिसर में पानी का कुंड आज भी मौजूद है | तीन दिन के इस मेले के दौरान कुंड में गंगाजी प्रकट होती हैं | चतुर्थी की मध्य रात्री को कुंड में स्नान करना पवित्र माना जाता है |
एक अन्य लोककथा के अनुसार व इतिहास के अनुसार प्राचीन युग में इस भूमि पर महाराजा द्रुपद का शासन था | उनके पुत्र का नाम दृष्टद्रुम और पुत्री का नाम द्रौपदी था |
जब पांडवों को 14 वर्ष अज्ञातवास में रहना पडा, तब वे भेष बदलकर यहीं आएं थे | उसी काल में महाराजा द्रुपद ने अपनी बेटी द्रौपदी का स्वयंवर रचा था | भगवान शिव के मंदिर के सामने कुंड में एक बड़ा सा स्तंभ रखा गया था | उसी स्तंभ के आधार पर तराजू के दो पलड़े उअर स्तंभ के ऊपर घूमती मछली राखी गयी थी | स्वयंवर में शामिल होनेवाले के लिएँ मछली की आँख को भेदने की शर्त राखी गई थी | महाराज द्रुपद की सभा में कीं राजा-महाराजा ऐसा करने में विफल रहें | इसी सभा में ब्राह्मण के भेष में पहुंचे अर्जुन ने मछली की आँख को भेदकर वरमाला पहनाई |
जब द्रौपदी को लेकर अर्जुन सहित पाँचों भाई घर पहुंचे तो माता कुंती से कहा; देखो माँ, हम क्या लेकर आएं है? तो माता कुंती ने दरवाज़ा खोलने से पहले ही कह दिया कि जो भी लाएं हो, पांचो भाई आपस में बाँट लो | ईस तरह पांच पांडव और द्रौपदी माता की आज्ञा को कैसे नकारते? तब से द्रौपदी के पांच पति थी और उसी कारण उसे "पांचाली" नाम दिया गया था | बाद में ईस भूमि को भी "पंचा प्रदेश" से लोग आज भी जानते हैं |
लोक संस्कृति की परम्परा को उजागर करने वाला यह मेला करीब दो शताब्दी पूर्व शुरू हुआ था | मेले में खासकर पशुपालक जातियों के लोगो का बड़ा आकर्षण रहता है | उन्हें खेलते हें देखने के लिएँ देस-परदेस से बड़ी संख्या में लोग आते हैं | यहाँ स्थानीय जातियों में ज्यादातर कोली, ठाकोर, अहीर, काठी और रबारी-भरवाड (पशु पालक) मुख्य हैं | ईस जाती के बड़ी बड़ी मूछों वाले युवकों के साथ युवतियों को परम्परागत हुडो, रास-गरबा, टिटोडो, डांडिया खेलते समय दोहे और छंद गाते हुए देखना-सुनना एक अनूठा सौभाग्य ही है | हुडो में पशुपालक युवा-युवतीयां एक कतार में आमने सामने खड़े होते हैं | फिर सब साथ मिलकर प्राचीन लोकगीत गाते हुए ताली बजाकर आमने-सामें हथेलियाँ टकराते हें नाचते हैं | जब रास करते हैं तब तो डंडिया के साथ गोल घुमाते हें हवा में दो-दो फूट ऊंचाई तक कूदकर गाते हैं | ईस कूदने की गति के साथ जितने भी खेलने वाले हों, उन सबके पैर हवा में होते हैं | उस वक्त का नज़ारा देखते ही बनाता है | मेले में रंगबिरंगी कढाई किएँ गाएँ कपड़ों से सजाया गया बड़ा सा छाता लेकर अहीर युवक सोने के गहनों से सजाकर ढोल के ताल पर "छाता नृत्य" करता है |
ईस मेले में खासकर पशुपालक जाती के विविध खेलों को देखने के लिएँ विदेशी पर्यटक उमड़ते हैं | इन लोगों के रंगबिरंगी वस्त्रों के कारण फिल्म और फोटोग्राफी के शौकीनों को मजा आता है | एसा कहा जाता है कि फिल्म वालों के रील भी यहाँ कम पड़ते हैं | कुछ सालों से घुड़सवारी और बैलगाड़ी के साथ ग्राम्य खेलों - कब्बडी, पकड़ दौड़ को शामिल करके ग्राम्य ओलम्पिक का भी आयोजन होता है | उसे प्रोत्साहित करने के लिएँ राज्य सरकार की ओर से पुरस्कार भी दिएँ जाते हैं |
ईस प्रकार प्रयागराज में लाखों की तादाद में भाविकों की भीड़ उमड़ती है, उसी प्रकार तरणेतर के मेले में भी लाखों लोग श्रद्धा-भक्ति के साथ रोचक खेलों के देखने भी आते हैं | वैसे तो भारतीय परंपरा में मेले का दो प्रकार का महत्त्व है | एक धर्म की श्रद्धा और दूसरा सांस्कृतिक रीत-रिवाजों के खेल के साथ युवा-युवतियों का मेलाप करवाना | आज भी पशुपालक जाती के बुज़ुर्ग लोग ईस मेले में अपने बच्छों की पसंद देखने और उसे दिखाने आते है | तरणेतर का मेला आज भी धर्म-श्रद्धा और परंपरागत खेल-संक्स्कृति का द्योतक है |
सौराष्ट्र की सुहानी धरती को रंगभरा लोकसमूह, उसके पर्वत, दिलावर दरियालाल, शेरों की दहाड़ों से गूंजता हराभरा गीर का जंगल, मवेशीओं को लेकर जंगल में ही रहते पशुपालकों का नेस, प्यारे गाँव और राजे-महाराजे की स्मृति से साभार शहर.... भक्ति, भजन और शहीदों के स्मारक (पाळीया) प्रत्येक गाँवों के भव्य ईतिहास की गवाही देता है |

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"ॐ", गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फूट रोड, सुरेंद्रनगर-363 002 गुजरात