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सोने की मछली और भगवान बुद्ध-- स्‍वामी आनंद प्रसाद 'मनसा'


बात उस समय की है, जब भगवान बुद्ध श्रावस्ती में विहरते थे। श्रावस्ती नगर के पास केवट गांव के कुछ मल्लाहों ने अचरवती नदी में जाल फेंककर कर एक स्वर्ण-वर्ण की अद्भुत मछली को पकड़ा। कहानी कहती है अचरवती नदी.....जो चिर नहीं है......अचिर यानि क्षणभंगुर है।

ऐसा ही तो जीवन है, प्रत्‍येक प्राणी क्षण-क्षण बदलते प्रवाह के संग-साथ जाता है और पकडना चाहता है। जाल फेंक कर बैठे है, अचरवती के किनारे, कोई पद का, यश का, धन का, नाम का......की मछली को पकड़-पकड़ को कहां पकड़ पाता है। कास हम समझ जाते ये जीवन क्षण भंगुर है।

सोने की मछली तो मल्‍लाहों ने पकड़ ली, जिसका शरीर तो सोने का था, परन्‍तु उसके मुख से भयंकर दुर्गंध आ रही थी।

यहां भी शरीर तो लाखों लोग सोने जैसा पा लेते है। पर अन्‍दर तो सब सड़ रहा है। देखो किसी सुंदर स्‍त्री को पड़ो उसके प्रेम में, जैसे-जैसे तुम पास आते हो शरीर तो स्‍वर्ण तो सोने का पा लिया है। पर अंदर तो सब सड़ गल रहा है। अहंकार, व्‍यमनस्‍य, क्रोध....भरा है, प्रेम की सुवास कहां है वहां। उस से सब ढका है। अंदर कुड़ा कर्कट भरा है।

यहां सुन्‍दरत्‍म देह तो मिल सकती है, लेकिन अंदर तो कुरूपता ही होगी। कहां पाओगे सुन्‍दर आत्‍मा, किसी मीरा, सहजो, किसी लल्ला, में ही स्‍वर्ण आत्‍मा के दर्शन हो सकते है। वहीं वास पाओगे सुन्‍दर देह और सुन्‍दर आत्‍मा। इससे पहले कहां तृप्‍ति हे।

लेकिन ये सब दूसरों के लिए नहीं है। ये सब तुम्‍हारे लिए ही है, तुम्‍हारे पास सुन्‍दर शरीर तो है पर कहां है सुन्‍दर आत्‍मा। तीर को फल अपनी और करके देखना। तभी तुम्‍हें पता चलेगा की यह है अचरवती , झांक करे देखना एक बार उसमे शायद दिख जाये हमें हमारा असली रूप। हमारे सब शिष्‍टाचार, सौम्‍यता, उपर-उपर ही लिपी पूती है। उपर से हम छाप तिलक लगा, दाढ़ी बढ़ा बन बैठेंगे संत। हजारों को छल सकेंगे। पर अंदर तो वहीं गंदगी भरी है। वहीं रोग सड़ रहा है। उपर ही उपर सज्‍जनता है अन्‍दर अंदर अभी भी जंगली जानवर तैयार खड़ा है। जरा सा खूरोचा नहीं निकल कर बहार खड़ा हो जाता है। आप इसे अपने ही जीवन अनुभव से देखे तोले, तीर अपनी तरफ रखें तभी समझ पायेंगे। दूसरों में देखना आसान है। अपनी तरफ बहुत मुश्किल है।

मल्‍लाहों की समझ में बात आई नहीं, ऐसी मछली तो पहले न देखी थी न सुनी थी। जब बात सर से उपर चली गई तो वह राज के पास गये। भला राजा को भी कहां समझ में आनी थी। वह भी सीमित संकुचित बुद्धि का होगा हमारा प्रतिनिधित्‍व हमसे अलग कैसे हो सकता है। राजा उसे द्रोणी में रख कर भगवान के पास ले गए। और उसी समय मछली में अपना मुख खोला।

देखा मल्लाहों नहीं समझे,समझ आती है बात कहां सोना देखा है। कहां कंचन काया जानी, जीवन बस किसी तरह रेग रहा है। पर राजा तो सोने में जीता, सोने की काया को भोगता, सोने के ही वर्तनों में खाता है। उसकी भी समझ में नहीं आई। मल्‍लाहों को क्षमा किया जा सकता हे। उनमें कोई विरला ही कबीर, नानक, रवि दास...ही सोने की मछली को समझ सकते है। पर गरीबी में कहां ध्‍यान...वहां तो मांग ही शुरू नहीं हुई है सही तरीके से। लेकिन धन वैभव हो तो तुम उसके पास देख सकते है। कि ये सब पा कर भी कुछ नहीं मिला अंदर तो अभी खाली का खाली ही है।

राज को भी समझ में नहीं आया, फिर क्‍या, समझें कथा क्‍या कहती है। आखिर हम सब को जाना होगा एक दिन बुद्ध के पास वहीं निवारण है वहीं निर्वाण है। किसी जाग्रत पुरूष के संग बैठना हो उसकी छांव में । संग साथ लेना होगा उनकी तरंगों का जो तुम्‍हें अपने साथ उड़ा ले चले, बिन पंखों के। किसी और लोक की और, जिसकी तुम कल्‍पना भी न कर सको। वहीं होश ही तुम्‍हारी सारी उलझनों सुलझा सकता है। वहीं तुम्‍हारी उलझी बेल सुलझ सकती है। वहीं समाधान है, जो समाधि प्राप्‍त कर चुका है, वहीं कर सकता है हमारा समाधान, हमारा रूपान्‍तरण, बदलाव, उससे पहले कोई मार्ग नहीं।

जैसे ही मछली को भगवान के सामने लाये उसने अपना मुख खोला—क्‍यों खोला मछली ने अपना मुख? याद आ गई होगी, आवक रह गयी होगी, बुद्ध को देख कर चल चित्र की भी बह गई होगी अपने पीछे जीवन में। उस बुद्ध कि याद आ गई होगी जिसका संग साथ किया था पहले। अरे यह क्‍या? फिर वहीं सौन्दर्य, वहीं तरंगें, वहीं सुगंध, वहीं शांतिएक बार फिर। समझ में नहीं आया होगा कि ये सब क्‍या है। कैसे है। खुला रह गया होगा उसका मुख। कितने कम भाग्‍य शाली लोग होते है। जो फिर-फिर उसी वर्तुल में घूम कर बुद्धों के सामने आ जोत है। हम तो बचते है, बचना ही चाहते है। कोई न कोई बहाना कर टाल देना चाहते है। उनके आस पास जाने से भी कतरते है। उनके शब्‍द कानों में न पड़ जाये इस लिए बच कर दूसरे रास्‍ते से चल जाते है। क्या कि हम समझदार है, कोई मूढ़ नहीं जो कोई हम बहका फुसला ले। और तो मुर्ख है अज्ञानी है। पर हम तो....ओर मर जाने के बाद कितनी श्रद्धा भगती से पूजा करते है। आरती का थाल सजाते है। तिलक टिका भी लगा देते है। भोग लगो प्रसाद भी ग्रहण कर लेते है। वह आग तो चली गई अब तो उस का फोटो है छुओ उसे नहीं जलेगा तुम्‍हारा है। पर यहीं शायद हमारे अहंकार को तृप्‍ति देता है।

जीवत बुद्ध को तो देख कर तुम्‍हें भरोसा नहीं आता। कि कोई बुद्धत्‍व भी है। हमारी अकड़...समझदारी बन हमारा बचाव कितनी खूबसूरती से करती है। प्राचीन परंपरा है कि गुरु के पास कोई जाये तो उसे झुकना होगा। तभी तो तुम भर सकोगे अपनी गागर को, बहती रहे नदी तुम जीवन भर उस अकड़े खड़े रहो और कहो की यहां कोई पानी नहीं है। देखो मुझे तो मिला ही नहीं और लोग झूठ बोल रहे है। होता तो क्‍या मुझको नहीं मिलता। अकड़े खड़े रहो खाली लोट आओगे। इसमें नदी को कोई कसूर नहीं है। पानी तुम्‍हारे कंठ को कैसे छुए यही तो कला है गुरु के संग जाने की, तब हम कह सकते है, ये कोई ध्‍यान-वान नहीं सब मंद बुद्धि आदमी की बनाई हुई बात है। कोई समाधि नहीं होती। कोई बुद्धत्‍व नहीं होता। सब पागल है...

राजा ने पूछा: भंते, भगवान का ही अति सुंदर छोटा रूप है, भंते, क्‍यों इसका शरीर स्‍वर्ण का हो गया। और इसके मुख से कितनी दुर्गंध आ रही है। भगवान ने मछली को गोर से देख, चले गये उसके पूर्व जन्‍म में ऐक्सरे मशीन की तरह....ओर कहा यह कोई साधारण मछली नहीं है।

यह कश्‍यप बुद्ध के शासन काल में कपिल नाम का एक महा पंडित भिक्षु था। संन्‍यास धारण किया था इसने। त्रिपुटक था, ज्ञानी था, विद्यावान था। देखा आपने ज्ञान से अंहकार कटता नहीं और मजबूत हो जाता है। धन, पद, यश, नाम तो तुम्‍हारे कपड़ों की तरह से है। पर ज्ञान तो तुम्‍हारी चमड़ी की तरह है। धन छोड़ सकते हो, घर छोड़ सकेत हो बड़े मजे में। पर चमड़ी को छोडने के लिए विकट साहस की जरूरत है। वो तो कोई विरल ही कर सकता है। चमड़ी को उतरना कठिन है। इसलिए आपने देखा बोधक तोर से ज्ञान लोग अहंकारी होते है। अहंकार और ज्ञान का चोली दामन का साथ है।

ऐसा अकसर होता है, महावीर को उसके ही शिष्‍य मखनी गोशालक ने धोखा दिया। महा पंडित था, बड़ा ज्ञानी था...पर क्‍या हुआ। बुद्ध को उसके ही चचेरे भाई देवदत्त ने मारने की कोशिश की। साथ खेला था, बुद्ध से दीक्षा ले उनका संन्‍यासी हुआ। सुसंस्‍कृत था, सुसभ्‍य था। ज्ञानी था। ऐसा ही जीसस के साथ हुआ सब अनपढ़ थे एक पढ़ा लिखा शिष्‍य था जूदास, तीस रूपये में बेच दिया अपने ही गुरू को। ऐसा अक्‍सर क्‍यों होता है क्‍यों ये सब बार-बार दोहराया जाता है। ओशो को उनकी ही शिष्‍य शीला ने जहर देने की कोशिश की और्गन का पूरा का पूरा आश्रम खत्‍म करा दिया किस वजह से , वो खुद गुरु होना चाहती थी। पढ़ी लिखी थी, जब उसने पहली बार ओशो को देखा तो बस वही की होकर रह गई। आई थी अपने पिता के संग नहीं गई घर। ओशो ने एक बार प्रवचन में उस के लिए मील के पत्‍थर के शब्‍द कहे थे, ‘’शीला तै तय किया गज्‍जब’’ ( रज्‍जब तै तय किया गजब) जब ये शब्‍द पढ़े तो मेरी आंखें भर आई। इतनी उच्‍चाई से भी कोई गीर सकता है। तो वह बच नहीं सकता। आज यूरोप की जल में सड़ रही है शील....। बौधिक पंडित सदा धोखा दे जाते है। इसने अपने गुरू को धोखा दिया। इसकी देह तो स्‍वर्ण की हो गई पर अंदर दुर्गंध भरी रह गई।

राजा को इस कथा पर भरोसा नहीं आया, तुमको भी नहीं आयेगा। किसे आता है, कौन मानने को तैयार है कि मृत्‍यु के बाद भी कुछ है। इसका क्‍या प्रमाण है। पर मृत्‍यु के बाद नहीं तो जन्‍म के बाद तो हम हजारों प्रमाण देखते है। एक ही माता पिता से एक ही कोख से जन्‍म लेने के बाद दो सन्‍तान एक सी नहीं होती, न बौधिक तोर से शारीरिक तोर से ये भिन्‍नता आती कहां से कुछ तो ऐसा है जो यहां का नहीं है, फिर वह यहां रह ही कैसे सकता है। ..

राजा ने कहां आप इस मछली के मुख से कहलाये तो मानें। सोचना बुद्ध की बात पर यकीन नहीं आया। भरोसा नहीं आया। पर मछली अगर बोल दे तो यकीन आ जाए, ऐसा है मनुष्‍य फिर गिरेगा अचरवती में, यही है वेदन, पीड़ा। देखी आदमी की मूढ़ता ऐसी होती है। क्षुद्र बातों पर बहुत भरोसा करता है। विराट छूटता चला जाता है। मछली कहे तो मानें।

भगवान हंसे, शायद करूणा के कारण, चला एक और मछली की रहा पर। और उन्‍होंने राजा को देखा। मछली की आंखों में झांक कर कहां, याद करो भूले को याद करों तुम्हीं हो कपिल, झांक कर देखो, तुम्हीं हो कपिल?

मछली बोली: हां, भंते, मैं ही कपिल हूं।

ये कथाएं मनोविज्ञान का संकेत देती है। ये बोध कथा ये है, जैसे आपने देखा ईसप की कहानियां, या पंच तंत्र की कहानियां, जिसमें शेर बोलता है, खरगोश बोलता है। जानवर बोर रहे है, पर बच्‍चें कितने आनंद से पढ रहे है। समझ रहे है, बुद्धों के सामने तो हमारा मानसिक विकास बच्‍चों से भी कम है। ये कथाएं हमारे जीवन दर्शन की कथा कहती है। हमारी चेतना के तलों को भी उजागर कर रही है। हमारी समझ को हमारे ही सामने पार दर्श कर रही है। कहां है हमें होश बुद्ध के होश के सामने, तो अभी हम गहरी तन्‍द्रा में सोये है। छोटे बच्‍चों से भी छोटे है।

हों, भंते, मछली ने कहां: ‘’मैं ही कपिल हूं। और उसकी आंखों से पश्‍चाताप के आंसू भर आये। गहने सम्‍मोहन में केंद्रित हो गई, पश्‍चाताप से भर जार-जार आंसू बह चलें। आगे कोई शब्‍द नहीं निकला। खो गई उस क्षण में जब अपने गुरू को धोखा दिया था। आंखे खुली की खुल रह गई, मुहँ भी यथा वत खुला हा, और प्राण निकल गई। मर गई मछली पल भर में।

पर एक चमत्‍कार हुआ, उसका मुख तो पहले की तरह ही खुला था पर अब उसमें दुर्गंध नहीं थी। जैसे ही पुराने वाली दुर्गंध हवा के साथ विलीन होने लगी। अपूर्व सुगंध से भर गई वह जगह। एक मधुर सुवास चारों तरफ फेल गई।

राजा चुका मछली पा गई। उलटी दुनियां है। राजा अभी भी बैठा देख रहा है। सोच रहा होगा जरूर बुद्ध ने कुछ किया है। कोई चमत्‍कार कोई वेन्‍ट्रीलोकिस्‍ट जानते होंगे, राजा की समझ में कुछ नहीं आया। राजा होने भर से क्‍या समझ विकसित हो जाती है। वेन्‍ट्रीलोकिस्‍ट मूर्ति को बुलावा दे, गड्ढे को बुलवा दे, मछली को बुलवा दे। उसके होठ नहीं हिलते पर बोलता वही है।

गंध कुटी के चारों तरफ एक सुवास फेल गई। एक गहन शांति छा गई। समाधि के मेघों से सीतलता बरसाने लगी। एक ही क्षण में क्रान्‍ति घटित हो गई। एक सन्‍नाटा, विषमय, और प्रसाद का चारों और फेल गया। अवाक हर गये लोग, संविग्‍न, विषमय विमुग्ध, जड़ वत खड़े रह गये लोग। भाव विभूत हो गये लोग।

जीते जी दुर्गंध आ रही थी। मर कर तो और अधिक आनी चाहिए थी। पर नहीं कुछ अपूर्व घटा, कुछ ऐसा घटा जो घटना चाहिए। जिस की प्रत्‍येक भिक्षु इंतजार करता है। मछली मर गई—उसका मुख खुला रह गया, पवित्र कर गया उसे अंतस में जमे अंहकार को, उसका पश्‍चाताप क्षण में गला गया पत्‍थर को जो जन्‍मों से उसे खाये चला जा रहा था। बुद्ध के सान्निध्य में मोम बन कर बह गया सब। परम भाग्‍य शाली थी। गल गया पिघल गया उसका अन्‍तस आंसू बन कर।

किसी दूसरे बुद्ध को धोखा दिया और किसी बुद्ध के समक्ष पश्‍चाताप किया समय की दुरी है, पर बुद्धत्‍व का स्‍वाद वहीं है। अहंकार लेकर मरी थी किसी बुद्ध के संग और अहंकार गर्ल कर मर गई किसी दूसरे बुद्ध के सामने। क्षमा मांग ली। आंसू बन गए। इससे सुन्‍दर क्षण मरने का कहां प्राप्‍त होता है। सौभाग्य शाली रही। मछली, परम भाग्‍य शाली थी।

चारो तरफ कैसा सन्नाटा छा गया। सारे भिक्षु इक्‍कट्ठे हो गये। मछली को देखने के लिए। जो दुर थे वो भी भागे, कि ये दुर्गंध कैसे उठी, ये सब उन लोगो ने देख, मछली को बोलते, मरते, फिर महाराज को भी देखा। फिर बुद्ध के अद्भुत वचन सुने, जैत वन जो पहले दुर्गंध से भर गया था अचानक अपूर्व सुगंध से भरने लगा। भिक्षु उस सुगंध से परिचित थे। उन्‍हें भली भाति ज्ञात थ जब वो गंध कुटी के पास से गुजरते थे तो वहीं गंध उनके नासापुट में भर जाती थी। बुद्धत्‍व की गंध थी। पुरी प्रकृति में पेड़ पर उसके फूल खिलते है तो अपनी-अपनी गंध बिखरते है। तो जब मनुष्‍य का फूल खिलेगा तो उसकी अपनी कोई गंध नहीं होगा। हम उस गंध को नहीं जान सकते जब तक हम अंदर गंदगी से भरे है। ध्‍यान हमारे, तन मन की स्‍वछता का नाम है।

मछली उपलब्‍ध होकर मरी, एक क्षण में क्रांति घट गई। क्रांति जब घटती है। क्षण में ही घटती है। ये हमारे बोध की बात है त्‍वरा की बात है।

धम्म पद्य


In:

वासवदत्‍ता और भिक्षु उपगुप्‍त : स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’


रात्रि का गहरा सन्‍नाटा, चारों तरफ फैले अँधियारे में भी बाजार की रौनक चकाचौंध थी, चारो तरफ मानों यौवन उन्माद पर था, युवकों और युवतियों के झुंड के झंड अठखेलिया करते परि विहर रहे थे। इसी समय वासव दत्ता भी अपने रथ पर अभिसार को निकली। यौवन के मद में मस्त‍ नगर-नटी वासव दत्ता निकले देख कर सब की आंखे उसके रूप यौवन पर जाकर रूक गई। एक झलक पार भी लोग अनुगृहीत हो जाते थे। और जिस को संग-साथ मिल जाये तो वो तो दुनियां में अपने आप को धन्य भागी समझता था। ऐसा रूप थे वासव दत्ता का।

वासव दत्ता एक नगर वधू थी यानि सारे नगर की वधू, नगर-नटी—सारे शहर में उसके यौवन का जादू छाया था। जो सुंदरतम लड़कियां होती थी, उसे नगर-वधू बना दिया जाता था, ताकि लोगों में संघर्ष न हो, कलह न हो, झगड़ा ना हो। जो सुंदरतम है उसके लिए बहुत प्रतियोगिता मचेगी, झगड़ा होगा, वह सब की हो, एक की न हो। यह वासवदत्‍ता उस समय कि सुंदरतम युवती थी।

वासवदत्‍ता अभिसार को निकली है अपने रथ पर सवार होकर, फूलों से सजी। वह पास से गुजरते बौद्ध भिक्षु उपगुप्त को देख कर ठिठक गई, उसकी मदमस्‍त चाल, हाथ में एक भिक्षा पात्र शरीर पर एक चीवर कोई आभूषण नहीं उसने तो आभूषणों से लदा सौंदर्य देखा था। सुंदर वस्‍त्रों में लिपटे शरीर, जो शरीर की कुरूपता को केवल छीपा सकते है। उसमें सौंदर्य नहीं भर सकते यह हमारी आंखों में एक भ्रम पैदा कर देते है एक आवरण का चशमा पहना देते हे। आज उसकी आंखों ने कोरा सौंदर्य देखा, शुद्ध और स्फटिक हीरा जो अभी तराशा नहीं गया था परन्‍तु उसमें से उसकी आभा छलक कर प्रसाद कि तरह बिखर रही था। उसकी आँखों को विश्वास नहीं आया। क्‍या ऐसा सौंदर्य भी हो सकता है, इस कुरूप संसार में, जो केवल देह के भोग में लिप्‍त होते हे। उनके चेहरे पर वासना का एक काला साया उसे घेरना शुरू कर देता हे।

उसने सम्राट देखे हे, द्वार पर भीख मांगते सम्राट देखे है। उसके द्वार पर भीड़ लगी रहती थी राजपुत्रों, नवयुवक, धनपति यों की सभी को उसका मिलना हो भी नहीं पाता था। बड़ी महंगी थी वासवदत्‍ता। लेकिन ऐसा सुंदर व्‍यक्ति उसने कभी नहीं देखा था। वासवदत्‍ता ने रथ रोक कर उसे आवाज़ दी। वह जो भिक्षु उपगुप्‍त था। वह शांत मुद्रा में अपना भिक्षा पात्र लिए चला जा रहा था। उसने सोचा भी नहीं की कोई नगर बधू उसे पूकारेगी। वह तो अपनी आंखों को चार फीट आगे—जैसा भगवान बुद्ध न कहा था, चार फीट से ज्‍यादा मत देखना—अपनी आंखों को गडाएं चुपचाप राह पर गुजर रहा था। उसके चलने में एक अपूर्व प्रसाद था। एक लय वदिता थी, एक गौरव गरिमा थी। जो एक संन्यासी के चलने में ही हो सकती है। जो एक शांत झील कि तरह स्फटिक जरूर है परंतु वो गहरा भी है। उसके तनाव चले गए, वह शांत है। अपने भीतर रमा चुपचाप चला जा रहा है।

संन्‍यासी अपूर्व रूप से सुंदर हो जाता है। संन्‍यास जैसा सौदर्य देता है, मनुष्य को और कोई चीज नहीं देती। संन्‍यस्‍त होकर तुम सुंदर न हो जाओ, तो समझना की कही भूलचूक हो रही है। और संन्‍यासी का कोई शृंगार नहीं है। संन्‍यास इतना बड़ा शृंगार है कि फिर और शृंगार की कोई जरूरत नहीं हाथी।

तुमने देखा कि संसारी भोगियों को। जवानी में शायद सुंदर होता हो। लेकिन जैसे-जैसे बुढ़ापा आने लगता है, असुंदर होने लगता है। लेकिन उससे उल्‍टी घटना भी घटती है। संन्‍यासी के जीवन में; जैसे-जैसे संन्‍यासी वृद्ध होने लगता है, वैसे-वैसे और सुंदर होने लगता है। क्‍योंकि संन्‍यासी का कोई वार्द्धक्‍य होता ही नहीं, संन्‍यासी कभी बूढा होता ही नहीं। महात्‍मा गांधी का जवानी की चित्र जितना बदसूरत दिखता है बुढ़ापे में अति सुंदर से सुंदरतम होते चले गये थे।

इसलिए तो हमने बुद्ध और महावीर, राम, कृष्‍ण के चित्रों में युवा दिखाया है। यह इस बात कि खबर देता है कि संन्‍यासी चिर-युवा है। हमने अपूर्व सौंदर्य से भरी मूर्तियां बनायी है महावीर, बुद्ध की उनमें न कोई साज है, न शृंगार है। कृष्‍ण की मूर्ति को तो हम सज़ा लेते है, मोरमुकुट बाँध देते है। रेशम के वस्‍त्र पहना देते है, धुँघरू पहना देते है। हाथ में कंगन डाल देते है, मोतियों के हार लटका देते है। बुद्ध और महावीर के पास तो वह भी नहीं है। वह तो नग्‍न खड़े है, एक चीवर में, लेकिन फिर भी अपूर्व सौंदर्य है। ऐसा सौंदर्य जिसको किसी सजावट की कोई जरूरत नहीं।

एक इस उपगुप्‍त को निकलते देखा वासवदत्‍ता ने। और वासवदत्‍ता सुंदरतम लोगो को जानती थी। सुंदरतम लोगो को भोगा है। सुंदर से सुंदर से उसकी पहचान है। सुंदरतम उसके पास आने को तड़पते है। उसके रथ को रोक लेते है, उसके आगे पलकें बिछाए खड़े रहते है। बौद्ध भिक्षु उपगुप्‍त को देख कर वह ठिठक गई, दीपक के प्रकाश में—राह के किनारे जो दीपस्‍तंभ है उसके प्रकाश में—वह सबल, स्‍वस्‍थ और तेजो दीप्‍त गौर वर्ण संन्‍यासी को देखती ही रह गई। ऐसा रूप उसने कभी देखा नहीं था। संन्‍यासी का सहज सौंदर्य उसके मन को डिगा देता है। अब तक लोग उसके प्रेम में पड़े थे, पहली बाद वासवदत्‍ता किसी के प्रेम में पड़ती है। वह संन्‍यासी को अपने घर आमंत्रित करती है। संन्‍यासी बडी बहुमूल्‍य बात उत्‍तर में कहता है।

उपगुप्‍त उससे कहता है—‘जिस दिन समय आ जाएगा, उस दिन मैं स्‍वयं ही तुम्‍हारे कुंज में उपस्थित हो जाऊँगा। वासवदत्‍ता कहती है कि भिक्षु मेरे घर आओ, बैठो रथ में, मैं तुम्‍हें अपने घर ले चलूगी, वहां तुम्‍हारी सेवा करूंगी, सब मेरे दास बनने को आतुर रहते है मेरा मन तुझ पें आ गया है। मैं खुद तेरी दासी बनने को तैयार हूं।’

भिक्षु उपगुप्त ने कहा: ‘आऊँगा, सुंदरी अवश्‍य आऊँगा। समय जब पूकारेगी में आ जाऊँगा, अभी तुझे मेरी नहीं मैं वासना कि जरूरत है। जब तुझे मेरी जरूरत होगी तो जरूर आऊँगा ये मेरा वादा रहा। समय कि प्रतीक्षा।’

और कहानी कहती है बहुत दिन गुजर गये, वासवदत्‍ता प्रतीक्षा करती रही। उसका मन अब और किसी में नहीं रमता था। वह अपूर्व रूप आंखों के सामने गुजरता रहता। एक प्रति छवि की तरह जिसे चाहा कर भी भोगना तो दुर रहा उसे छू भी नहीं सकती थी। इस संसार में अब राग-रंग उसे कुछ भी नहीं भाते थे। एक लगन सी अन्‍दर ही अन्‍दर कुरेदती रहती थी। परन्‍तु वह यह नहीं समझ पा रही थी कि कैसे पाया जाए उस संन्‍यासी को जिस मार्ग से वो संसार में प्रत्‍ये‍क वस्‍तु को पाना जानती थी। उसी मार्ग से वे संन्‍यासी को ढुड़ रही थी। खुशबु को देखा नहीं जा सकता केवल उसे महसूस किया जा सकता है, उसने फूलों को कुचल कर इत्र निकालना आता था। अदृश्‍य सुगंध की पकड़ने की उसकी थाह नहीं थी।

बहुत लोग आते, बहुत लोगों से संबंध भी बनाती। नगर-बधू थी वह, उसका काम था, वेश्‍या थी वासवदत्ता, लेकिन अब देह में वह दीप्ति न दिखाईं देती थी। कुछ और आँखों में बस गया था जिसे वे जानती नहीं थी कि कैसे पाऊँ। अब धीरे-धीरे वक्‍त के साथ उसका देह में रस कम होता जा रहा था। उसका भी सौंदर्य धीरे-धीरे उतर पर आ रहा था। उपगुप्‍त के वो शांत आंखें उसका पीछा करती रहती थी। उसकी वह आभा, वो निर्मलता, वो चाहा कर भी नहीं भूल पा रही थी। रात को सपने में भी अचानक चौक पड़ती थी दासी को आवाज देती, पसीने से सराबोर दासी उसे पानी देती। फिर पुरी रात उसे निंद नहीं आती। अब मदिरा ने भी अपना काम बंद कर दिया था। वो होश को खोने की बनस्पत और बढा देती थी, वो आंखे उसका पीछा करती ही रहती.....।

लेकिन बात सुन ली थी उसने उपगुप्‍त की कि जब समय आएगा तब आ जाऊँगा। इतने बल पूर्वक कही थी बात कि यह बात भी साफ हो गयी थी: उपगुप्‍त उन लोगों में से नहीं है जिसे डि गाया जो सके। जो कहा है, वैसा ही होगा, समय कि प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तो वासवदत्‍ता ने कभी बुलाने की चेष्‍टा नहीं की। कभी रहा पर आते-जाते शायद उपगुप्‍त दिखायी भी दे जाता, लेकिन फिर उसे बुलाने की हिम्‍मत ना कर सकी, शायद उसने इसे उचित भी नहीं समझा, न ही ये उचित था। संन्‍यासी ने बात कह दी थी। प्रतीक्षा और प्रतीक्षी ....उसका सारा जीवन बीत गया। एक आशा कि किरण प्रकाश पुंज की तरह उसके अंदर चमकती रही जाने अनजाने।

फिर एक रात्रि—पूनम कि रात्रि—उपगुप्‍त मार्ग से जा रहा थे। उन्‍होंने देखा कि कोई मार्ग पर रूग्‍ण पडा करहा रहा है। गांव के बाहर एक निर्जन स्‍थान पर शहर कि भीड़-भाड़, चमक दमक से दुर। उसने आवाज दी कोन है। वहां। वासवदत्‍ता केवल कराहती रही, उसका पुरा शरीर जर्जर, वसंत के दानों से गल सड़ गया था। वह सुंदर काया, सुगंधित इत्रों से जो महँकती थी वह आज गल गईं थी। उपगुप्‍त ने प्रकाश में देखा: ‘वासवदत्ता, अरे, पहचान मुझे मैं हु तुम्हारा उपगुप्‍त।

वासवदत्ता ने आंखें खोली शायद अंतिम धड़ी पास थी। साँसे भी मंद होती जा रही थी। उसने उसकी छुअन को पहचान लिया, उसके जलते ज़ख़्मों में एक शाति लता उतरती चली गर्इ। आंखें में जल धार बह निकली। उपगुप्‍त ने वासवदत्‍ता का सर उठा कर अपनी गोद में रख लिया। और वसंत रोग से उसके चेहरे पर फफोले पर स्नेह पूर्व हाथ फेरने लगा।

यह जो महारोग है—वसंत रोग इसको कहते है। नाम भी हमने क्‍या खूब चुना है, इस देश में नाम भी हम बड़े हिसाब से चुनते है। सारे शरीर पर काम-विकार के कारण फफोले फैल गए है। यौन-रोग है। लेकिन हमने नाम दिया है बसंत रोग—जवानी का रोग, वसंत का रोग जो अब तक सौंदर्य बनकर प्रकट हुआ था। वही अब कुरूपता बनकर प्रगट हो रहा है। जो अब तक चमड़ी पर आभा मालूम होती थी, वह घाव बन गयी है। सारा शरीर घावों से भर गया है सड़ रहा है।

वासवदत्‍ता: मुझे मत छुओ मुझे वसंत रोग हो गया है। कोई मुझे छूना नहीं चाहता। कोई प्रेमी नहीं बचा, सब नाक मुहँ पर कपड़ा रख कर मेरे पास से गुजर जाते है।‘ आज यौवन बीत गया ऐसे क्षण में कोई प्रेमी न बचा, कोर्इ नगर में रखने को भी तैयार नहीं है। मेरी घातक बीमारी तुम्‍हें भी लग जाएगी उपगुप्‍त मुझे एक घूँट पानी पीला दो, दो दिन से एक बूंद पानी गले में नहीं गया तीन दिन से मृत्‍यु का इंतजार कर रही हुं।

उपगुप्‍त ने अपने भिक्षा पात्र उसके कंठ से लगा दिया एक जल कि बूंद कंठ को ही नहीं अंदर की आत्मा को तृप्‍त कर गई। आंखे खुली की खुली रह गई मानों उपगुप्‍त को निहार रही हो। दम तोड़ दिया वासवदत्‍ता ने उपगुप्‍त की बाँहों में।

जिसके चरण चूमते थे सम्राट। एक असहाय अबला की मोत मरी वासवदत्ता। शहर से बहार फिकवा दिया था, कही ये रोग किसी दूसरे को न लग जाए। वही स्‍त्री जिसे लोग सर आंखें पर लिए फिरते थे, अंतिम समय वो सर, एक भिक्षु की गोद में जिसे भी वो भोगना चाहती थी।

एक दयामय मूर्ति उपगुप्‍त, ने आने का, सेवा को जो वादा किया था वो पूरा किया।

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''भाव ही भगवान है''. - संजीव 'सलिल'

एक वृद्ध के मन में अंतिम समय में नर्मदा-स्नान की चाह हुई. लोगों ने बता दिया की नर्मदा जी अमुक दिशा में कोसों दूर बहती हैं, तुम नहीं जा पाओगी. वृद्धा न मानी... भगवान् का नाम लेकर चल पड़ी...कई दिनों के बाद उसे एक नदी... उसने 'नरमदा तो ऐसी मिलीं रे जैसे मिल गै मतारे औ' बाप रे' गाते हुए परम संतोष से डुबकी लगाई. कुछ दिन बाद साधुओं का एक दल आया... शिष्यों ने वृद्धा की खिल्ली उड़ाते हुए बताया कि यह तो नाला है. नर्मदा जी तो दूर हैं हम वहाँ से नहाकर आ रहे हैं. वृद्धा बहुत उदास हुई... बात गुरु जी तक पहुँची. गुरु जी ने सब कुछ जानने के बाद, वृद्धा के चरण स्पर्श कर कहा : 'जिसने भाव के साथ इतने दिन नर्मदा जी में नहाया उसके लिए मैया यहाँ न आ सकें इतनी निर्बल नहीं हैं. मैया तुम्हें नर्मदा-स्नान का पुण्य है लेकिन जो नर्मदा जी तक जाकर भी भाव का अभाव मिटा नहीं पाया उसे नर्मदा-स्नान का पुण्य नहीं है. मैया! तुम कहीं मत जाओ, माँ नर्मदा वहीं हैं जहाँ तुम हो.''

'कंकर-कंकर में शंकर', 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का सत्य भी ऐसा ही है. 'भाव का भूखा है भगवान' जैसी लोकोक्ति इसी सत्य की स्वीकृति है. जिसने इस सत्य को गह लिया उसके लिये 'हर दिन होली, रात दिवाली' हो जाती है.

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